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कर्नाटक हाई कोर्ट ने 6 लोगों को जिंदा जलाने वाले शख्स को सुनाई उम्रकैद की सजा

  बेंगलुरु । कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2013 में मैसूर में एक घर में आग लगाकर एक ही परिवार के छह लोगों की हत्या करने के मामले में आरोपी अब्दु...

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बेंगलुरु । कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2013 में मैसूर में एक घर में आग लगाकर एक ही परिवार के छह लोगों की हत्या करने के मामले में आरोपी अब्दुल शरीफ उर्फ आमिर जान को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी को बरी करने के मैसूर सत्र न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए उसे दोषी करार दिया।न्यायमूर्ति एचपी संदेश और न्यायमूर्ति बी. प्रमोद की खंडपीठ ने कर्नाटक सरकार की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। सरकार ने आरोपी को बरी करने के मैसूर के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायालय के 28 अप्रैल 2018 के फैसले को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया। अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या, धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास और धारा 436 के तहत आग या विस्फोटक पदार्थ के जरिए मकान को नुकसान पहुंचाने के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही उसे संबंधित विचारण अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।मामला मैसूर के उदयगिरि थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार, अब्दुल शरीफ और मोहम्मद आमिर जान के परिवारों के बीच पैसों को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद के चलते शरीफ ने 12 अप्रैल 2013 की आधी रात को कथित तौर पर पेट्रोल डालकर घर में आग लगा दी।

आग की चपेट में आने से मोहम्मद आमिर जान, उनकी मां अफरोज बेगम, रेशमा, अंजुम, रिजवान और रिजाना गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में उपचार के दौरान सभी छह लोगों की मौत हो गई।घटना के समय आरोपी की उम्र करीब 50 वर्ष थी। अब उसकी उम्र 63 वर्ष है।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आवश्यक साक्ष्य, जिसमें विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी शामिल है, रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। इसके बावजूद विचारण अदालत इन साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन करने में विफल रही।

अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने इस बात को लेकर अनावश्यक रूप से विचार किया कि आग या धमाका तत्काल हुआ था अथवा कुछ समय बाद। उच्च न्यायालय के अनुसार, यह मुद्दा मामले के लिए महत्वपूर्ण नहीं था और इसके कारण उपलब्ध साक्ष्यों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
उच्च न्यायालय ने कहा कि विचारण अदालत द्वारा आरोपी को बरी करना गलत था। निचली अदालत के आदेश में गंभीर त्रुटियां थीं, इसलिए उसे रद्द किया जा रहा है।अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अब्दुल शरीफ को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही उसे निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

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